“Bihar Chunav: Jitan Ram Manjhi ne kiya bada bayan, maang ki thodi-bahut sharab peene walon ko maafi”

बिहार की राजनीति हमेशा से ही चर्चाओं में रहता है। यहाँ के चुनाव केवल दलों और उम्मीदवारों के बीच नहीं होते, बल्कि मुद्दों और विचारधाराओं के बीच भी होते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। बिहार चुनाव से ठीक पहले, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष जितनराम मांझी ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने न सिर्फ राजनीतिक हलचल मचा दिया है बल्कि शराबबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
मांझी ने हाल ही में कहा है कि “थोड़ी-बहुत शराब पीने वालों को सरकार माफी दे।” उनका यह बयान सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर तेजी से वायरल हो रहा है। बिहार में लागू शराबबंदी कानून पहले से ही विवादों के घेरे में रहा है और इस बयान ने इसे नया मोड़ दे दिया है।
बिहार में शराबबंदी – एक नज़र
बिहार में अप्रैल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने शराबबंदी कानून लागू किया था। इसका उद्देश्य था राज्य को नशामुक्त बनाना और समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, घरेलू विवाद और अपराधों को कम करना। शुरुआती दिनों में इस कानून को काफी समर्थन भी मिला और इसे एक बड़े सामाजिक सुधार के रूप में देखा गया।
लेकिन समय के साथ इस कानून को लेकर कई सवाल उठने लगे। तस्करी, अवैध शराब का कारोबार, जहरीली शराब से मौतें, जेलों में भीड़ और छोटे-छोटे मामलों में गरीब लोगों की गिरफ्तारी जैसे मुद्दों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं।
मांझी का बयान क्यों महत्वपूर्ण है?
जितनराम मांझी दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले नेता माने जाते हैं। उनका बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वे नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी रह चुके हैं और उनकी पार्टी अक्सर एनडीए के साथ चुनाव लड़ती है। चुनाव से ठीक पहले इस तरह का बयान देना यह संकेत भी देता है कि राज्य में शराबबंदी कानून को लेकर आम जनता में असंतोष है, जिसे राजनीतिक पार्टियां भुनाने की कोशिश कर सकता हैं।
मांझी का कहना है कि जो लोग थोड़ी-बहुत शराब पीते हैं और समाज में कोई अपराध नहीं करते, उन्हें कठोर सजा देना उचित नहीं है। उनका सुझाव है कि ऐसे मामलों में सरकार को नरमी बरतनी चाहिए ताकि छोटे-छोटे मामलों में लोगों को जेल न जाना पड़े और न्यायिक प्रणाली पर भी बोझ न बढ़े।
जनता की प्रतिक्रिया

मांझी के इस बयान पर जनता की राय बंटा हुआ दिखता है।
- समर्थन में राय: कई लोग मानते हैं कि शराबबंदी कानून का मकसद सही था लेकिन इसका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हुआ। छोटे-छोटे उपभोक्ताओं को सजा देकर समस्या हल नहीं होगा, बल्कि तस्करी और अवैध कारोबार पर कड़ी कार्रवाई करना चाहिए।
- विरोध में राय: दूसरी ओर, शराबबंदी समर्थकों का कहना है कि अगर “थोड़ी-बहुत” शराब पीने वालों को माफी दी गई तो कानून की गंभीरता खत्म हो जाएगी और लोग इसका गलत फायदा उठाएँगे।
राजनीतिक मायने
बिहार चुनाव में शराबबंदी एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। नीतीश कुमार ने इसे अपनी उपलब्धियों में गिनाया है, जबकि विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन इसके दुष्परिणामों की ओर इशारा करते हैं। मांझी के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मांझी का यह बयान उनकी पार्टी को ग्रामीण और गरीब वोटरों में सहानुभूति दिलाने की कोशिश है। बहुत से गरीब लोग शराबबंदी कानून के तहत जेल जा चुके हैं, जिससे उनके परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक बोझ बढ़ा है। मांझी की यह मांग उनके लिए राहत की उम्मीद पैदा कर सकता है।
कानून में संशोधन की जरूरत?
कई कानूनी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद से अब तक जो अनुभव मिले हैं, उनके आधार पर इसमें कुछ संशोधन करना जरूरी है।
- पहली बात, उपभोक्ता और तस्कर में फर्क किया जाना चाहिए।
- दूसरी बात, पहली बार पकड़े गए लोगों के लिए चेतावनी या जुर्माने जैसे हल्के दंड का प्रावधान किया जा सकता है।
- तीसरी बात, अवैध कारोबार और जहरीली शराब के नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई जारी रहनी चाहिए।
मांझी का बयान इन सभी चर्चाओं को बल देता है और सरकार को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मौजूदा कानून में सुधार की जरूरत है।
महिलाओं का नजरिया
बिहार में शराबबंदी का एक बड़ा कारण महिलाओं की मांग था। घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवादों में शराब को एक बड़ी वजह माना गया। कई महिला संगठन अब भी शराबबंदी को पूरी तरह जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर थोड़ी-बहुत शराब की छूट दिया गया तो समाज में फिर से पुराने हालात लौट सकते हैं।
चुनावी रणनीति

चुनाव के समय हर राजनीतिक दल जनता के मुद्दों को उठाकर अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है। मांझी के बयान से यह साफ है कि शराबबंदी का मुद्दा इस बार भी चुनावी राजनीति में छाया रहेगा।
- अगर सरकार नरमी दिखाती है तो उसे कानून के समर्थकों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।
- अगर सरकार सख्ती बरकरार रखती है तो उसे उन गरीब और छोटे उपभोक्ताओं की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है जिन पर यह कानून भारी पड़ रहा है।
निष्कर्ष
बिहार में शराबबंदी कानून लागू हुए लगभग आठ साल हो चुके हैं। इस दौरान इसके कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू सामने आए हैं। जितनराम मांझी का यह बयान इस बात का संकेत है कि अब समय आ गया है कि सरकार इस कानून की समीक्षा करे और जरूरत पड़ने पर इसमें बदलाव करे।
थोड़ी-बहुत शराब पीने वालों को माफी देने का विचार विवादित जरूर है, लेकिन इससे एक बहस जरूर शुरू हुई है कि समाज को नशामुक्त बनाने के साथ-साथ गरीब और छोटे उपभोक्ताओं के साथ न्याय कैसे किया जाए।
आने वाले बिहार चुनाव में यह मुद्दा कितना असर डालता है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि मांझी के इस बयान ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है और सभी दलों को अपनी रणनीति नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।